मंगलवार, 23 मार्च 2010

शहीदे आजम की यादों को तो जिंदा रखो

क्या कम्युनिस्ट पार्टियों और सिक्ख समाज के ही रह गए हैं भगत सिंह
दुर्ग। शहीदे आजम भगत सिंह का शहादत दिवस आया और चला गया। शहर के लोगों को पता ही नहीं चल पाया। अभी जो पीढ़ी ताजा-ताजा जवान हो रही है, उसे यह मालूम ही नहीं है कि भगत सिंह कौन थे। किसी समय सरकारी स्कूलों में सरदार भगत सिंह और उनक जैसे महापुरूषों के जन्मदिन और शहादत दिवस मनाए जाते थे, किन्तु जिन अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए भगत सिंह और उन जैसों ने अपनी शहादत दी, आज हर पालक अपने बच्चों को उन्हीं अंग्रेजों की तरह बनाने महंगे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में शिक्षा दिलवा रहे हैं। नतीजा सामने है। ऐसे स्कूलों को देश के प्रति कुर्बान होने वालों से कोई वास्ता नहीं है। स्कूली किताबों से महापुरूषों के योगदान लगभग गायब हैं और ताजा-ताजा जवान हो रही पीढ़ी तेज रफ्तार बाइक, पिज्जा, बर्गर, और मौज-मस्ती में इस कदर डूब रही है कि सरदार भगत सिंह की शहादत भी बेमायने हो गई है।
शहर में आल इंडिया यूथ फेडरेशन नाम का एक संगठन है, जिसने पखवाड़ेभर पहले स्टेशन रोड़ पर ग्रीन चौंक में स्थित शहीदों की प्रतिमाओं की सुध ली। फेडरेशन ने इन प्रतिमाओं के खंडित होने, महापुरूषों की जीवनियों के बोर्ड ध्वस्त होने और प्रतिमाओं का रंग-रोगन उखडऩे पर गम्भीर आपत्ति की और इस आशय का एक ज्ञापन भी महापौर डॉ. शिवकुमार तमेर को दिया। शायद इसी का नतीजा था कि शहीदे आजम के शहादत दिवस से पहले नगर निगम ने प्रतिमाओं का संधारण और सौंदर्यीकरण का कार्य करवाया। दरअसल, यूथ फेडरेशन जैसे कुछ संगठन ही हैं, जो महापुरूषों की यादों को संजीदा बनाए रखने रखने प्रयासरत् है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इस युवा संगठन ने इससे पहले दुर्ग की शिवनाथ नदी को बेचे जाने का मामला प्रमुखता से उठाया था। तब सत्ता में बैठी कांग्रेस की चूलें हिल गई थी। विपक्ष में भाजपा थी और नगर के विधायक हेमचंद यादव थे। यही यादव भाजपा की सरकार बनने के बाद जलसंसाधन मंत्री बने लेकिन 6 साल बीत जाने के बाद भी वे शिवनाथ को पूंजीपतियों और पानी का व्यापार करने वालों से मुक्ति नहीं दिला पाए। इस नदी का 13 किलोमीटर से ज्यादा का क्षेत्र आज भी रेडियस वाटर नामक कम्पनी के हाथों में है और वे इसका पानी बेचकर करोड़ों रूपए कमा रही है। कोई माई का लाल आवाज उठाने की जहमत नहीं उठा रहा है। जबकि इसी नदी से दुर्ग और भिलाई शहरों के अलावा नदी के आसपास के सैकड़ों गांवों को पानी मिलता है और यह अब एक निर्विवाद तथ्य है कि पानी की कमी न सिर्फ दुर्ग-भिलाई बल्कि उन सैकड़ों गांवों में भी गम्भीर जलसंकट है।
बात शहीदे आजम की हो रही थी। मंगलवार को सरदार भगत सिंह का शहादत दिवस था। इससे ठीक एक दिन पहले सिक्ख समाज ने स्टेशन रोड स्थित गुरूद्वारे में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। अगले दिन यूथ फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने ग्रीन चौंक स्थित शहीदे आजम की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि दी और क्रांतिकारी गीतों का उद्घोष किया। एक संक्षिप्त कार्यक्रम मे भगत सिंह की जीवनी पर प्रकाश डाला गया। सवाल यह है कि क्या सरदार भगत सिंह सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी और (सरदार होने के कारण) सिक्ख समाज के ही होकर रह गए हैं? आजादी की लड़ाई में जनसंघ (या भाजपा) की क्या भूमिका थी, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। इसलिए यदि भाजपा शहीदे आजम की अनदेखी कर रही है तो यह उसकी अपनी नीतियां हैं, लेकिन क्या कांग्रेसियों का दिमाग भी फिर गया है? शहीदे आजम भगत सिंह, महात्मा गांधी की नीतियों और कार्यों से इत्तेफाक नहीं रखते थे, यह सर्वविदित है और इसीलिए उन्होंने क्रांति का मार्ग चुना। पर कुछ सालों पहले तक यही कांग्रेस भगत सिंह और उनके जैसे शहीदों के नाम पर ही राजनीति करती रही है। तो क्या इसका यह मतलब है कि अब कांग्रेस को ऐसे शहीदों के नाम पर राजनीति करने से भी गुरेज है? या फिर उसने भी यह जान लिया है कि भगत सिंह और उन जैसे शहीदों को जनता ने भुला लिया है इसलिए उनकी स्मृतियों में कोई आयोजन करने का औचित्य नहीं है?

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