रविवार, 16 मई 2010

प्रचंड गर्मी से सड़कें हुई सुनसान

दुर्ग, 16 मई। दुर्ग समेत पूरे प्रदेश में लू की स्थिति निर्मित हो गई है। पारा 44 डिग्री को पार कर गया है।  गर्म हवाओं के थपेड़ों ने लोगों का जिना मुहान कर दिया है। चिलचिलाती धूप ने लोगों को घर में दुबकने मजबूर कर दिया है। उमस भरी गर्मी से लोग पसीने से तर-बतर हो रहें हैं। यही वजह है कि प्रचंड गर्मी से सड़कें सुनी हो जाती हैं। पशु-पक्षी भी पानी की तलाश में बेहाल हो रहें हैं। मौसम विभाग ने तापमान यथावत बने रहने संभावना जतायी है। आज शाम तेज अंघड़ के साथ हल्की बरिश की संभावना जतायी गई है। सूर्य देव के उग्र तेवर से प्रदेश में लू की स्थिति निर्मित हो गया है। बादल के बाद भी भीषण गर्मी से राहत नहीं है। सुबह से ही उमस ने लोगों का बुरा हाल कर दिया है। प्रदेश लू की  चपेट में है। दस बजे के बाद वातावरण में गर्म हवाओं के थपेड़े  शुरू हो जातें हैं जो शाम तक चलता रहता है। दुर्ग सहित प्रदेश में भरी दोपहरी में सड़कें सूनसान नजर आने लगी है। दिन व रात में उपस की स्थिति होने से लोग पसीने से तर-बतर हो रहे हैं। गर्मी से बचने गमछे, स्कार्फ, टोपी का सहारा ले रहें हैं। वहीं अब पंखे व कूलर भीषण गर्मी से लोगों को राहत नहीं दे पा रही है। पशु पक्षियों का भी बुरा हाल है। मूक पशु पक्षी प्यास से हैंड पंपों कुओं तालाबों व नलों की टोटियों के आस-पास भटकते नजर आतें हैं।  सूर्य की तेज आग के लपटों के समान तेवर बरसने लगें हैं। मौसम विभाग के अनुसार प्रदेश के तापमान यथावत रहने संभावना जतायी गई है। तापमान 44 डिग्री पर स्थिर रहने संभावना है। मौसम विज्ञानी ने बताया कि पूर्वी मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़  होते तमिलनाडू तक द्रोणिका में कोई हलचल नहीं होने से ताममान भी स्थिर रहने संभवना है। वहीं रविवार की शाम तक प्रदेश के कुछ इलाकों में अंधड़ चलने के साथ हल्की बारिश की संभावना जतायी गई है।

1 टिप्पणी:

  1. जहां देखो लोग गरमी का रोना रो रहे है। हर आदमी परेशान है। जहां देखों वहां बस गरमी की ही चर्चा है। क्या रेडियो, क्या टीवी, क्या अखबार हर जगह यही बात हो रही है की इस बार बहुत गरमी हो रही है। टीवी पत्रकार तो सड़को पर लोगों को रोक रोक कर पूछ रहे है-भाईसाहब, बहुत गरमी है? आपको कैसा लग रहा है? अब भले आदमी, गरमी है तो हर किसी को गरमी ही लगेगी न, आपके पूछने से सर्दी तो नहीं लगने लगेगी। पर वे भी क्या करें, उनका अपना चैनल है जिसे उन्हें चौबीसों घंटे चलाना है। मजबूरी है। गरमी पहले भी होती थी, पर इतनी नहीं होती थी। टीवी थे नहीं जो पल पल चढ़ते पारे की सूचना दें। इसलिए गरमी का अहसास भी कम था।

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